निकाय प्रमुखों के चुनाव पार्षदों से करवाएं जाने पर राजस्थान सरकार में भी विचार, तो अब कांग्रेस भी मानती है कि..........


निकाय प्रमुखों के चुनाव पार्षदों से करवाए जाने पर राजस्थान सरकार में भी विचार। 
तो अब कांग्रेस भी मानती है कि कश्मीर से अनुच्छेद ३७० के हटने के बाद माहौल राष्ट्रभक्ति का है। 
कांग्रेस शासित मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने फैसला किया है कि स्थानीय निकायों के प्रमुखों के चुनाव निर्वाचित पार्षदों के द्वारा ही करवाया जाएगा। माना जा हा है कि अब ऐसा ही निर्णय राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार भी लेगी। राजस्थान में इसी वर्ष ५२ निकायों के चुनाव होने हैं, इसमें जयपुर नगर निगम भी शामिल हैं। शेष निकायों के चुनाव अगले वर्ष पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव के बाद होंगे। यानि अब मेयर, सभापति और नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव पार्षद करेंगे। असल में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के साथ ही विधानसभा में प्रस्ताव पास कर निर्णय लिया गया है कि निकाय प्रमुखों का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होगा। यानि आम मतदाता अपने शहर कि निकाय संस्था का प्रमुख चुनेंगे। प्रदेश में जब भाजपा का शासन होता है तब पार्षद द्वारा ही निकाय प्रमुखों के चुनाव होते हैं, लेकिन कांग्रेस का शासन आने पर प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली को लागू कर दिया जाता है। लेकिन इस बार राजस्थान में कांग्रेस सरकार अपने ही फैसले से पीछे हट रही है। देश के बदले हुए हालातों में अब कांग्रेस नहीं चाहती कि निकाय प्रमुखों का चुनाव सीधे मतदाता करें। कांग्रेस को लगता है कि कश्मीर से अनुच्छेद ३७० को हटाने के बाद देश में राष्ट्रभक्ति का माहौल है, जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा। चूंकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए पार्षदों को प्रभावित कर अनेक निकायों में कांग्रेस के प्रमुख बनवाए जा सकते हैं। निकाय चुनाव में वार्ड स्तर पर उम्मीदवार की छवि का भी फर्क पड़ता है। राजस्थान में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सभी २५ सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। इसलिए अब गहलोत सरकार निकाय चुनावों में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है। भले ही निकाय चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हों, लेकिन राष्ट्रभक्ति के आगे फिलहाल सभी मुद्दे गौण हो रहे हैं। कांग्रेस को अब इस पर भी विचार करना चाहिए कि राष्ट्रभक्ति के माहौल का फायदा कांग्रेस को क्यों नहीं मिलता? जबकि राष्ट्रभक्ति तो सभी राजनीतिक दलों के नेताओं में होनी चाहिए। देखना होगा कि निकाय चुनाव प्रणाली में बदलाव का कांग्रेस को कितना लाभ मिलता हैं। 


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