लखनऊ में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में , सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी नहीं मानेगा विवादित समुदाय के लोगों..


तो क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी नहीं मानेगा?
बोर्ड का ताजा बयान कितना मायने रखता है।
१२ अक्टूबर को लखनऊ में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक हुई। इस बैठक के बाद बोर्ड की ओर से कहा गया कि अयोध्या में बावरी मस्जिद के विवादित जमीन छोडऩा मंजूर नहीं है। यानि यदि सुप्रीम कोर्ट विवादित जमीन को रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़े के पक्ष में फैसला देता है तो भी मुस्लिम पर्सनल लॉल बोर्ड को मंजूर नहीं होगा। यानि बोर्ड सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी नहीं मनेगा। मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था माने जाने वाले पर्सनल लॉ बोर्ड का यह रुख तब सामने आया है, जब मात्र पांच दिन बाद १७ अक्टूबर को कोर्ट में बहस पूरी होनी है तथा १५ नवम्बर तक फैसले के बारे में १५ नवम्बर तक ही पता चलेगा, लेकिन विभिन्न अदालतों में जो दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं उनसे प्रतीत होता है कि विवादित भूमि पर मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाई गई है। सब जानते हैंकि भारत पर ७०० वर्षों तक मुस्लिम  राजाओं का शासन रहा। इतिहास बताता है कि अनेक मुस्लिम राजाओं ने हिन्दू धर्म स्थलों को नुकसान पहुंचाया। इन्हीं में अयोध्या में भगवान राम के जन्म स्थाल पर बड़ा मंदिर भी  शामिल है। मुस्लिम राजाओं के बाद २०० वर्षों तक अंग्रेजों का शासन रहा। अंग्रेजों ने हिन्दू-मुसलमानों में फूट डाल कर शासन किया। १९४७ में जाते वक्त मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान बना दिया, लेकिन शेष भारत में ऐसे बीज बो दिए, जिनके कांटों से आज भी देश लहूलुहान हो रहा है। हालांकि अनेक मुस्लिम संगठनों ने अयोध्या में विवादित भूमि हिन्दुओं को देने की बात कही है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाएं देश में भाई चारे के विरुद्ध बयान देती रहती हैं। सवाल एक मंदिर का नहीं, बल्कि करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का है। भारत की सनातन संस्कृति तो हजारों साल पुरानी है और इसी संस्कृति में भगवान राम के जीवन का उल्लेख है, ऐसे में राम के जन्म स्थल को लेकर विवाद होना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का भी प्रयास था कि दोनों पक्षों में आपसी सहमति हो जाए, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। ऐसा नहीं कि आजाद के बाद से भारत में मुसलमानों पर अत्याचार हुए, इसलिए अब आक्रमणकारी बाबर के नाम पर बनी बावरी मस्जिद पर दावा नहीं छोडऩा चाहते हैं। सब जानते हैं कि मुस्लिम देशों से भी ज्यादा भारत में रहने वाला मुसलमान खुश है। यहां किसी तरह का भेदभाव नहीं होता। अनेक मुसलमान अपनी धर्म का पालन करते हुए भले ही हिन्दुओं के मंदिरों में न जाए और न ही प्रसाद ग्रहण करें, लेकिन लाखों हिन्दू मुस्लिम सूफी संतों की दरगाहों पर जाते हैं। न केवल जियारत करते हैं बल्कि तबर्रुख भी ग्रहण करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह हैं। ख्वाजा साहब की मजार पर जियारत करने वाले साठ प्रतिशत हिन्दू समुदाय के लोग होते हैं। क्या ऐसे माहौल में अयोध्या में भगवान राम का मंदिर नहीं बनना चाहिए? इस सवाल पर मुसलमानों के प्रतिनिधियों को गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए।