राजस्थानी भाषा की ७२ बोलियां, लेकिन फिर भी मान्यता नहीं।


राजस्थानी भाषा की ७२ बोलियां, लेकिन फिर भी मान्यता नहीं। 
उमर खय्याम की रुबाइयां आज भी प्रासांगिक। 
साहित्यकार डॉ. सूरज राव की दो टूक। 
एसपी मित्तल टॉक शो में १० अक्टूबर को राजस्थानी साहित्यकार और भाषा विशेषज्ञ व एमडीएस यूनिवर्सिटी के सहायक कुलसचिव डॉ सूरज राव से सीधा संवाद हुआ। डॉ. राव का पूरा इंटरव्यू यू-ट्यूब पर देखा जा सकता है।  डॉ. राव ने बताया कि ११वीं सदी के शायर और साहित्यकार उमर खय्याम ने जो रुबाइयां लिखी वे आज भी प्रासांगिक हैं। रुबाइयों के सामाजिक और अध्यात्मिक महत्त्व को ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने राजस्थान भाषा में अनुवाद कर पुस्तक का प्रकाशन किया है। हालांकि फारसी भाषा से राजस्थानी भाषा में अनुवाद करना बेहद कठिन था, लेकिन उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया। डॉ. राव ने कहा कि साहित्य की कोई सीमा नहीं होती। साहित्य का महत्व हर जगह बना रहता है। इसलिए मैंने ११वीं सदी के शायर की रुबाइयों का अनुवाद १९वीं सदी में किया है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा और साहित्य बेहद समृद्ध है। राजस्थानी भाषा में ७२ बोलियां बोली जाती है, लेकिन इसे दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा कि अभी तक भी राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिली है। डॉ. राव ने कहा कि जिस प्रकार अन्य क्षेत्र भाषाओं की फिल्मों को टैक्स से छूट मिली हुई है उसी प्रकार राजस्थानी फिल्मों को छूट मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राजस्थानी के साहित्य को संरक्षित करने की सख्त जरूरत है। उनका लगातार प्रयास है कि राजस्थानी साहित्य को संभाल कर रखा जाए, इसलिए उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. सूरज राव के राजस्थानी साहित्य में योगदान के लिए 


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