सुप्रीम कोर्ट ने मुम्बई के आरे क्षेत्र में पेड़ काटने पर रोक लगाई ?


सुप्रीम कोर्ट ने मुम्बई के आरे क्षेत्र में पेड़ काटने पर रोक लगाई। 
इसे कहते हैं सांप निकलने के बाद जमीन पीटना।
सरकार बड़ी या कोर्ट। शिवसेना का विरोध भी दिखावा। 
७ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के मुम्बई के बहुचर्चित आरे क्षेत्र में पेड़ काटने पर रोक लगा दी है। यानि अब महाराष्ट्र की सरकार पुलिस के दम पर आरे क्षेत्र में एक भी पेड़ नहीं काट सकेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से वे पर्यावरणविद खुश हो सकते हैं जो पिछले कुछ दिनों से आंदोलन कर रहे थे। लेकिन महाराष्ट्र सरकार के सूत्रों की माने तो अब आरे क्षेत्र में पेड़ काटने की जरुरत ही नहीं है, क्योंकि जिस ३३ हेक्टयेर भूमि पर मेट्रो का स्टेशन और लाइन के लिए खम्बे खड़े होने हैं, वहां के पेड़ ६ अक्टूबर की रात तक काटे जा चुके हैं। चूंकि कोर्ट ने मेट्रो के निर्माण कार्य पर कोई रोक नहीं लगाई है, इसलिए कटे हुए पेड़ों को हटा कर मेट्रो का स्टेशन बनाने आदि के कार्य जारी रहेंगे। असल में सरकार को भी पता था कि मुम्बई हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी, इसलिए हाईकोर्ट का फैसला आते ही पेड़ कटाई का काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया गया। ७ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने जो रोक लगाई है, उसका असर सरकार की जिद पर नहीं पड़ेगा। पर्यावरणविद् कुछ भी तर्क दें, लेकिन सरकार का कहना है कि मुम्बई की बढ़ती आबादी के लिए मेट्रो का विस्तार करना जरूरी है। जहां तक पेड़ों को काटने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान का सवाल है तो एक पेड़ की एवज में पांच से दस पेड़ लगाएं जाएंगे। यानि आरे क्षेत्र के पेड़ों की संख्या बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला वैसा ही है जैसा सांप निकलने जाने के बाद कोई व्यक्ति लकड़ी से जमीन को पीटता है। 
शिवसेना का विरोध सिर्फ दिखावा :
आरे क्षेत्र से पेड़ न कटे इसको लेकर शिवसेना ने भी विरोधी तेवर दिखाए। शिवसेना के युवा नेता आदित्य ठाकरे ने तो यहां तक कहा कि हमारी सरकार बनने पर पेड़ काटने के आदेश देने वाले अधिकारियों को पीओके में तैनात किया जाएगा। सवाल उठता है कि महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडऩवीस के नेतृत्व में चलने वाली भाजपा सरकार आखिर किसके समर्थन में चल रही है? चूंकि शिवसेना ने समर्थन दे रखा है इसलिए महाराष्ट्र में शिवसेना की ही सरकार है। सब जानते हैं कि मुम्बई महानगर में भाजपा से ज्यादा शिवसेना का प्रभाव है, इसलिए २१ अक्टूबर में शिवसेना के उम्मीदवार ज्यादा है। चुनाव में कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़े, इसलिए शिवसेना ने दिखाने के लिए पेड़ काटने का विरोध किया। यदि शिव सैनिक हकीकत में विरोध करते तो सरकार एक भी पेड़ नहीं काट सकती थी। 


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