कभी राजा से रंक तो कभी रंक से राजा ऐही तो संसार का नियम है, आशीर्वाद बंगला विका १५० करोड़ रूपऐ में।

 



वक़्त कब किसका पलट जाए कोई नहीं जानता..#वक़्त फ़िल्म का एक डायलाॅग है ना..
"चाय की प्याली हाथ मे उठा कर मुंह तक तक ले जाते-जाते कई बार बरसों बीत जाते है..पोटली रुपयों से भरी हो पर इंसान कभी-कभी भीख मांगने पर मजबूर हो जाता है"


..फिल्मी दुनिया में ये कारनामे अक्सर होते रहते हैं इनमें एक क़िस्सा एक घर का भी है जो अपने आप में इतिहास है


मेरठ से आया एक नौजवान जब बैजू बावरा में तू गंगा की मौज मैं जमुना की धार गीत अपने लहलारते बालों से गाता है तो फ़िल्मी दुनिया में तहलका मचा जाता है और रातों रात स्टार बन जाता है.. मैं भारत भूषण की बात कर रहा हूँ..भारत भूषण जब बुलंदियो पर थे तो जुहू बीच पर एक बंगला खरीदा.. सामने समंदर की लहरें और हवाएं..


सब कुछ सही चल रहा था तब भारत भूषण ने फिल्मों को प्रोड्यूस करने का सोचा बरसात की रात जैसे सुपर हिट फ़िल्म भी बनाई..फिर अगली दो-चार फिल्में नहीं चली, सितारे गर्दिश में आ गए..घाटा हुआ तो क़र्ज़ों के बोझ तले आ गए..अपनी जमा पूंजी बेच कर क़र्ज़े चुकाए जाने लगे जिसमें ये बंगला भी था..उन दिनों एक और स्टार तेज़ी से उभर रहा था 
राजेन्द्र कुमार..
राजेन्द्र कुमार का सितारा बुलंदी पर था तो ये बंगला भारत भूषण से इन्होंने 25 हज़ार रुपये में खरीद लिया..उन दिनों 25 हज़ार बहुत बड़ी रक़म हुआ करती थी..राजेन्द्र कुमार ने उस बंगले के नाम 'डिंपल" रखा जो उनकी बेटी का ही नाम है..बंगले में आने के बाद राजेन्द्र कुमार सफलता की सीढ़ियां चढ़ते ही गए..


फिर बीच मे राजेन्द्र कुमार का भी सितारा मद्धम हुआ क्योंकि एक और बड़ा स्टार फ़िल्मी दुनिया में छा चुका था..नाम था..
राजेश खन्ना..
राजेश खन्ना को ये बंगला बड़ा पसंद था पर राजेन्द्र कुमार उसे बेचने के मूड में नहीं थे..


लेकिन एक दिन अचानक राजेन्द्र कुमार को पैसों की ज़रूरत आन पड़ी..उन्होंने राजेश खन्ना को अप्रोच किया लेकिन कीमत इतनीं मांगी कि राजेश खन्ना जैसे स्टार को भी देने में मुश्किल आयी..कीमत थी 10 लाख रुपये..


राजेश खन्ना उन दिनों बड़े स्टार ज़रूर थे लेकिन मेहनताना इतना नहीं मिलता था कि एक साथ पेमेंट कर सकें..राजेश खन्ना को ये बंगला अपने हाथ से फिसलता नज़र आया..तभी एक और दिलचस्प वाक़या हुआ..
दक्षिण के एक बड़े फ़िल्म प्रोड्यूसर चिनप्पा देवर साहब हिंदी में एक फ़िल्म राजेश खन्ना साहब को लेकर बनाना चाह रहे थे..राजेश खन्ना बिज़ी थे अन्य फिल्मों में इसलिए वो इसे करने में आनाकानी कर रहे थे.. लेकिन चिनप्पा देवर साहब कहाँ मानने वाले थे.. राजेश खन्ना ने आख़िर उन्हें टरकाने कें लिये भारी भरकम रकम मांग ली..क़ीमत थी 10 लाख रुपये..
चिनप्पा देवर हैरान थे उस समय कोई भी बड़ा एक्टर 2 से 3 लाख ही लिया करता था राजेश खन्ना ने एक साथ 10 लाख मांगे..और साथ में ये कह दिया कि सारे पैसे एडवांस ही चाहिए क्योंकि मुझे एक बंगला खरीदना है..


चिनप्पा देवर जी ने सारी बात जानी और एक साथ 10 लाख रुपये थमा दिये राजेश खन्ना को..और फ़िल्म शुरू हुई जो सुपर हिट साबित हुई 
फ़िल्म का नाम था
'हाथी मेरे साथी'...


अब राजेश खन्ना इस बंगले के मालिक थे..लेकिन राजेन्द्र कुमार ने इस शर्त पर बंगला दिया कि इसका नाम आप कोई और रखेंगे डिंपल नहीं..
राजेन्द्र कुमार ने एक अन्य बंगला बनाया और उसमें यही नाम दुबारा रखा..राजेश खन्ना फौरन मान गए और अपने इस बंगले के नाम रखा
"आशीर्वाद"


लेकिन ये बंगला राजेश खन्ना को ज्यादा फला नहीं इसके लेने के दो-तीन सालों में ही राजेश खन्ना का कैरियर नीचे आता गया..शादी हुई इसी बंगले में लेकिन वो भी ज्यादा सफल नहीं रही..जिसका नतीजा अलहदगी हो गयी राजेश खन्ना और डिंपल के बीच..


राजेश खन्ना इस बंगले में आने के बाद फिर वो कभी उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच सके जहां वो पहले थे..


धीरे-धीरे वो भी गुमनाम होते गए और आख़िर में मरने के बाद अपनी वसीयत में ये बंगला जब वो अपनी बेटियों के नाम कर गए तो उन्होंने इसे बेच दिया और आधा-आधा पैसा बांट लिया..


आशीर्वाद बंगला बिका 150 करोड़ रुपये में..


आखिर में भारत भूषण..?


जिनका ये बंगला था..वो जीवन के आख़िरी सफ़र तक एक चाल (झोपड़पट्टी) टाइप में ही रहे और बसों  में सफर करते रहे वो बस से उस बंगले से होकर कई बार गुज़रे और देखा करते जो कभी उनका अपना था..


वक़्त आख़िर इसे ही तो कहते है.....


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