मिनाक्षी निगम की कलम से निकलते हुए कुछ अनसुलझे रहस्य .....

26 नवंबर, 1949 को अंगीकृत किये गए भारतीय संविधान की किसी भी लाईन पर आज की सत्ताधारी सरकारें कितनी खरी उतर रहीं हैं , संवैधानिक पन्नों में दर्ज शब्दावली के अनुरूप कितने काम हमारी सत्ताधारी सरकारें करती नजर आ रही हैं, संविधान में लिखी लाईनों के अनुरूप कितनी आजादी हमें अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के वास्ते मिल पा रही है, आज संपूर्ण भारतवर्ष में कौन सी ऐसी सरकार है जो बिना किसी द्वेषराग, जातिवादी मानसिकता आदि आदि कुंठा से परिपूर्ण हुए बिना उन्हें पाले-पोषे निष्पक्ष भाव से सत्ता के सिंहासनों पर बैठकर आम जनमानस की भावनाओं का रत्ती भर भी खयाल रखती नजर आ रही हैं .....….......


फिलहाल अभी तक तो संजय आजाद की नजर में ऐसी कोई सरकार नहीं दिख रही है जो भारतीय संविधान में लिखी किसी भी एक लाईन को अंगीकृत करने का प्रयास मात्र भी कर रही हो। वैसे आजाद अपनी कलम से और भी बहुत कुछ लिखना चाहता है, किन्तु लेकिन परन्तु..... 


इन्हीं सरकारों के अधीन गुलाम नौकरशाहों की तिकड़मी साजिशों भरी चालों के चक्कर में आजाद जैसों को इस देश की  उन कथित संवैधानिक संस्थाओं के चक्कर लगाने पड़ रहें हैं। जहां की दीवारो-ओ-दर को यहां के भ्रष्टाचारियों ने जकड़ कर रख लिया है। 


बावजूद इसके मिनाक्षी निगम इन देशद्रोहियों लुटेरे भ्रष्टाचारियों की पोल यूं ही तब तक खोलता रहेगा जब तक कि ये भ्रष्टाचारी सही रास्ते पर आकर 26 नवंबर, 1949 के भारतीय संविधान में लिखी लाईनों के अनुरूप राष्ट्रहित और जनहित में अपनी कार्यप्रणाली को सुव्यवस्थित व सुचारू रूप से अंगीकृत नहीं कर लेते।


इसी आत्मविश्वास के साथ! अपनी शब्दों को आपके सामने ।


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