वाराणसी दालमंडी चौकी , तारिक आज़मी की मोरबतियां - जन्नत में क्या एक प्लाट मिलेगा नेता जी ।








वाराणसी. वैसे सियासत कभी वसूलो पर हुआ करती थी। मगर आज कल सियासत में रवादारी तलाशनी पड़ जाती है। वोट की चाहत हो या फिर किसी अपने को बचाने की कवायद हो नेतानगरी अपना काम किया करती है। मैंने आज तक मोर्बतिया से लेकर दालमंडी सीरिज़ के तहत कई स्टोरी लिखा। मगर कभी किसी को इतनी आपत्ति नही हुई थी, जितनी इस बार हो रही है। जिसको देखो आपत्ति दर्ज करवाने के लिए चारदीवारी फांदने को तैयार बैठा है।कुछ ऐसा ही हाल कल की अपनी एक खबर के बाद देखा, समझ नही आ रहा था कि कौन मुझको समझाना क्या चाहता है। वैसे स्पष्ट बताता चलता हु कि खबर जिसके मुतैल्लिक लिखा गया था वह तो ख़ामोशी के दफ्तर में ही है। मगर कथित रूप से खुद को उनका चाहने वाला बताने वालो की भीड़ ऐसा लगा कि मुझे मोबाइल पर ही मोबलीचिंग कर डालेगी और शब्दों के तीर छोड़ छोड़ कर घायल कर डालेगी। एक सज्जन तो इतने बड़े बने कि फोन पर मुझे पत्रकारिता का नियम समझाया, फिर उसके बाद पर्सनल चैट पर खुद का ही स्पष्टीकरण देने लगे। मुझे उनसे कोई एतराज नही है। भाई है अपना। नादान सही।मगर एक कारोबारी नेता ने तो जगह के नाम पर ही आपत्ति कर डाली। ऐसा लगा कि उनकी दूकान के ऊपर बने ऑफिस के अन्दर चलने वाली पार्टी में खलल डाल दिया हो। तत्काल उन्होंने कहा कि दालमंडी नहीं फलनवा एरिया था। अमा कमाल करते हो साहब, पढ़ तो लिया होता पूरा कि दालमंडी बाहर है तो सराय या कुछ और अन्दर भी हो सकता है। मगर क्या करेगे साहब, बाज़ुओ पर कुर्ते की आस्तीन चढाने की आदत भला बरसो की कैसे छूटे इतने जल्दी। तो समझाने लगे भाई भाई…….। बहरहाल इतराज मैं उनका भी क्या करू साहब, बस दिल का क्या करे साहब, ये वही अटकता है जहा सबको खटकता है। वैसे भी उनका एतराज करके क्या खुद की शामत बुलानी है। कहा साहब अर्श और कहा मैं फर्श। सबका अपना अपना मिजाज़ होता है, हर जगह कोई न कोई शाहनवाज़ होता है (भाई कोई शाहनवाज़ को कुछ और न समझे, शाहनवाज़ एक उर्दू शब्द है जिसका मतलब बहादुर होता है।) अब बहादुर लोग तो हर जगह ही होते है।बहरहाल, देर रात एक नेता जी की नींद टूट गई। उन्होंने शायद रात को सोते सोते सपने में ही हमारा लेख/खबर पढ़ डाला होगा। वैसे तो साहब का नाम अरबी भाषा का है जिसका मतलब होता है माफ़ करने वाला। वैसे नेता जी अगर अरब में होते और वहा की सियासत में दो दो हाथ कर रहे होते तो उनको अदालत का मंत्री पद मिल सकता था क्योकि उनके नाम की एक तासीर ये भी होती है। मगर क्या किया जाए नेता जी ने दालमंडी ही सियासत में रवादारी दिखाने के लिए चुना। मगर नाम के मुताबिक रवादारी भी उनकी रही। साहब ने मुझको तो जन्नत में दो प्लाट और थोड़ी सपत्ति जहन्नम में भी दे डाली होती। वह तो वक्त बढ़िया था मेरे पास की नेता जी को बार बार नींद आ रही थी वरना कल रात को ही वह जन्नत के प्लाट को मेरे नाम हिब्बा कर दिए होते।वैसे जवाब बहुत कुछ होता है। मगर सबके जवाब देने से भी जवाब थोडा शर्मसार हो सकता है। अब एक साहब ने खबर को मज़हब से जोड़ डाला। बताइए अब खबरों का भी मज़हब से ताल्लुक होने लगा है। अमा मज़हब नही सिखाता आपस में बैर रखना ये लफ्ज़ 1930 के दशक में ही मशहूर शायर अल्लामा इकबाल ने इरशाद फ़रमाया था। अब मज़हब ये भी तो नही सिखाता कि गलत को गलत न कहो। भाई मेरा इंसानियत का मज़हब तो नही ही सिखाता है। आपका सिखाये तो अलग बात है। वैसे मेरे मरहूम वालदैन ने बचपन से मुझको एक ही बात सिखाई कि दुनिया का सबसे बड़ा मज़हब इंसानियत है। भाई एक बात बताओ मैंने कौन सा ऐसा गलत लिख दिया था। चलिए अगर गलत लिखा है तो आप नेता जी साबित कर डालो कि गलत लिखा है। मैं खंडन लिखने को तैयार हु।नेता जी आप तो मुझको अवार्ड दिलवा रहे थे। भाई जिस अवार्ड और जिस भाईचारे की बात आपने मुझसे किया न, उन अल्फाजो से बड़ा पुराना याराना है। आप तो आहे एक महीने पहले से भर रहे है, मगर शायद वो कलाम नही पढ़ा होगा कि आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक। नेता जी मेरा ईमान है, कि नही है ये मेरा रब मुझसे पूछेगा, और वही इसको बतायेगा क्योकि वह रब्बुल आलमीन है। खुद कुरआन में इरशाद फार्मा रहा है वह कि रब्बुल मश्रीकैन,व रब्बुल मग्रिबैंन। आप क्या खुद को खुदाई दावा कर रहे है हुजुर जो मेरे लिए जन्नत और जहन्नम तजवीज़ कर रहे है। वैसे आपकी जानकारी को बता दू कि मेरी जन्नत मेरे माँ के कदमो के नीचे थी। वही मौजूदा हालत में उनके कदमो के नीचे चप्पल रहती थी, जो खूब खाई है। मुझको जन्नत आपकी सिफारिश से नही अपनी माँ के कदमो में चाहिये।वैसे साहब सियासत के साथ जन्नत दिलवाने की रब से सिफारिश का भी काम तो बढ़िया है। किया जा सकता है। पूरी उम्र खूब पाप करे और उसके बाद आखिर में आपसे सिफारिश करवा कर जन्नत खुद के लिए ले ले। कमाल है वैसे साहब। थोड़ी जन्नत का टुकड़ा उन गरीबो को भी तकसीम कर दे साहब, जिनकी जिंदगी चप्पलो की मरम्मत में जहन्नम बनी हुई थी। वैसे आप साहब है। ऊँची पकड़ रखते है। सीधे अल्लाह से जन्नत दिलवा देते है। आपसे जुबा-दराजी करके क्या खुद तक़यामत जहन्नम में पकौड़े बनकर रहना है। मगर नेता जी आपके लफ्जों में बड़ी कशिश थी। आप भाई हो अपने भाई। पुरे बड़े भाई हो। जो भाई कहेगा वही ये कमबख्त नामाकुल तारिक आज़मी लिखेगा। आज से मुकम्मल तय कर लिया 










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