राष्ट्रपति होते हुए भी जनता से आम आदमी की तरह मिलते थे , मिडिया प्रभारी जय यादव कलम उनकी सादगी एक सलाम मिशाइल मैन जी को ।

अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व को किसी एक दायरे में सिमित नहीं किया जा सकता है। जिंदगी ने जब उन्हें जिस भूमिका को निभाने का दायित्व सौंपा वह उसपर खड़े उतरे। वे देश के राष्ट्रपति रहे, एक महान विचारक रहे, लेखक रहे और वैज्ञानिक भी रहे। हर क्षेत्र में उनका अहम योगदान रहा।अब्दुल कलाम का निधन आज से चार साल पहले २७ जुलाई को मेघालय के शिलांग में हुआ था। ऐसे में आज उनकी पुण्यतिथि पर आइए जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें और साथ ही कैसे ख़्वाब देखना और उसे पूरा करना कोई कलाम साहब की जिंदगी से सीख सकता है।२००२ में राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनकी सादगी के सभी कायल थे। उनके दरवाजे सदा आमजन के लिए खुले रहते थे। कई पत्रों का जबाव तो स्वयं अपने हाथों से लिखकर देते थे। उन्हें पीपुल्स प्रेसीडेंट भी कहा जाता है।अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु के रामेश्वरम में १५ अक्टूबर को हुआ था। उनका परिवार नाव बनाने का काम करता था। कलाम के पिता नाव मछुआरों को किराए पर दिया करते थे। बचपन से ही कलाम की आंखें कुछ बनने का ख़्वाब देखती थी। हालांकि उस वक्त परिस्थियां इतनी अच्छी नहीं थी। वह स्कूल से आने के बाद कुछ देर तक अपने बड़े भाई मुस्तफा कलाम की दुकान पर भी बैठते थे, जो कि रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन पर थी।फिर दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने पर जब ट्रेन ने रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन पर रूकना बंद कर दिया था, तब अख़बार के बंडल चलती ट्रेन से ही फेंक दिए जाते थे। उनके भाई शम्सुद्दीन को एक ऐसे इन्सान की ज़रूरत थी जो अख़बारों को घर-घर पहुंचाने में उनकी मदद कर सके, तब कलाम ने यह ज़िम्मेदारी निभाई। जब उन्होंने अपने पिता से रामेश्वरम् से बाहर जाकर पढ़ाई करने की बात कही तो उन्होंने कहा कि हमारा प्यार तुम्हें बांधेगा नहीं और न ही हमारी जरूरतें तुम्हें रोकेंगी। इस जगह तुम्हारा शरीर तो रह सकता है, लेकिन तुम्हारा मन नहीं।२००२ में राष्ट्रपति बनने के बाद डॉक्टर पहली बार केरल गए थे। उस वक्त केरल राजभवन में राष्ट्रपति के मेहमान के तौर पर दो लोगों को न्योता भेजा गया। पहला था जूते-चप्पल की मरम्मत करने वाला।। और दूसरा एक ढाबा मालिक…तिरुवनंतपुरम में रहने के दौरान इन दोनों से उनकी मुलाकात हुई थी।।डॉ कलाम ने कभी अपने या परिवार के लिए कुछ बचाकर नहीं रखा। राष्ट्रपति पद पर रहते ही उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी और मिलने वाली तनख्वाह एक ट्रस्ट के नाम कर दी। उऩ्होंने कहा था कि चूंकि मैं देश का राष्ट्रपति बन गया हूं, इसलिए जबतक जिंदा रहूंगा सरकार मेरा ध्यान आगे भी रखेगी ही। तो फिर मुझे तन्ख्वाह और जमापूंजी बचाने की क्या जरूरत।


सम्पर्क सूत्र :- कलाम द ग्रेट न्यूज़





 


 


 



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